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सपनों का नोटिफिकेशन

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सपनों का नोटिफिकेशन कवि : दिनेश नागर, राजस्थान आज स्वप्न-आकाश में आपके नाम का एक ताज़ा नोटिफिकेशन चमक उठा। सोचा— कितने दिन हो गए, आपकी टाइपिंग के वे धड़कते हुए तीन डॉट्स देखे हुए... तो क्यों न यादों की चैट एक बार फिर खोली जाए, दिल की इनबॉक्स में आपको सबसे ऊपर पिन कर दिया जाए— प्यार से... क्या पता— सपनों का नेटवर्क जुड़ जाए... और आपकी कोई मुस्कान मेरे मन की स्क्रीन पर धीरे-से उभर आए। तब हर सुबह आपकी याद का एक नया संदेश मिले, और आपकी मुस्कान मेरे जीवन का सबसे ख़ूबसूरत नोटिफिकेशन बन जाए। https://www.anubbutisevimarshtak.com/2026/06/vishwas-ka-andhpradesh-poem-dinesh-nagar.html  विश्वास का अंधप्रदेश  https://www.anubbutisevimarshtak.com/2026/06/kavi-dinesh-nagar-geele-baalon-ka-vah-kshan.html  गीले बालों का वह क्षण  https://www.anubbutisevimarshtak.com/2026/06/maa-ki-chhaya-kavita-dinesh-nagar.html  माँ की छाया https://www.anubbutisevimarshtak.com/2026/06/band-darwaze-par-aakhiri-ummeed.html बंद दरवाज़े पर आख़िर उम्मीद 

माँ की छाया

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माँ की छाया — दिनेश नागर, राजस्थान। आज घोंसले पर सन्नाटे ने पंख पसार दिए हैं। दो नन्ही आँखें अब भी आकाश टटोल रही हैं। एक क्रूर छलाँग पंखों तले सिमटी ममता की पूरी दुनिया उजाड़ गई। पिता की व्याकुल उड़ान देर तक आकाश में भटकती रही। पंखों से लड़ा, चोंच से वार किया... फिर घोंसला चुप हो गया। दो नन्हे प्राण घोंसले में सिमटे हैं। आँखों में एक ही प्रश्न— "माँ, तुम कहाँ गई?" हवा भी आज धीमे-धीमे चल रही है। शायद उसने भी इन नन्ही आँखों की व्यथा छू ली हो। और मैं... एक पल की देरी अब भी हृदय में काँटे-सी चुभ रही है। मैंने घोंसले के चारों ओर जाली का एक पहरा खड़ा कर दिया है— जैसे किसी छोटे-से देश ने अपनी सीमाओं पर अंतिम पहरा बिठा दिया हो। कि अब कोई क्रूर पंजा इन नन्हे पंखों तक न पहुँच सके। शायद मनुष्यता यही है— जहाँ जीवन काँप रहा हो, वहाँ एक सहारा बन जाना। और प्रकृति की गोद में आशा अब भी बाकी है। शायद पिता फिर सँभल जाए और इन नन्हे पंखों को उड़ना सिखा दे। कभी-कभी एक छोटा-सा घोंसला पूरे संसार की कथा कह जाता है। अब... रात का अँधकार चुपचाप बीत गया। मैंने दाना रखा, पानी रखा— फिर पिता की आहट सुनता रह...

पथ अभी शेष है

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पथ अभी शेष है अगर आज पथ पर आघात मिला है, तो समझो यात्रा का पथ अभी शेष है। जो व्यक्ति तुम्हारा होकर भी दूर चला गया, शायद उसकी नियति कहीं और लिखी थी। यदि आकांक्षाएँ अधूरी रह गई हों, फिर भी उम्मीदों को मौन मत होने दो, हर कथा का पूर्ण होना आवश्यक नहीं, कुछ अध्यायों को स्मृतियों में अमर होने दो। जब मन बार-बार प्रश्न करे— "अभाव मेरे हिस्से में ही क्यों आया?" तब उन चेहरों को याद करना, जिन्होंने आँधियों में भी मुस्कान सजाई है। यदि हृदय में पीड़ा का अथाह सागर है, तो उसे शब्दों की धारा बनने दो, और यदि सुख की कोई सरिता फूटी है, तो उसे अपनों के आँगन तक बहने दो। जब समय प्रतिकूल प्रतीत हो, तो व्यर्थ समय से युद्ध मत करना, क्योंकि घने बादलों की भी एक सीमा होती है, और क्षितिज पर सूर्य पुनः उग आता है। रोटी, छत और अपनों का साथ हो, तो शिकायतों का भार हल्का कर दो, जीवन कभी पूर्ण न्याय का वचन नहीं देता, तुम बस संघर्षों में भी जीने की कला अर्जित कर लो। जो छिन गया, उसे प्रारब्ध का निर्णय मान लो, जो प्राप्त हुआ, उसे ईश्वर का प्रसाद जान लो, और जो अभी भविष्य के गर्भ में है, उसके स्वागत में विश्वास की ल...