गीले बालों का वह क्षण
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मैंने सिर झुकाकर
उन्हें सँभालना चाहा,
पर वह हवा—
मानो किसी प्रिय की
उँगलियाँ धीरे-धीरे बालों में फिर रही हों।
उस स्पर्श में
एक अनकहा सुकून था,
किसी भूली-बिसरी स्मृति की आहट भी।
भीतर तक उतर आई थी वह नमी—
सिर्फ बालों में नहीं, मन में भी।
तभी सखियों की हँसी गूँजी—
"रुक, तेरी तस्वीर खींचते हैं!"
मैंने झट से बाल सँवार लिए,
होठों पर हल्की-सी मुस्कान खिल उठी,
और वह पल ठहर गया—
कैमरे में नहीं, हृदय में।
अब जब वह तस्वीर देखती हूँ,
तो लगता है—
वह कोई साधारण तस्वीर नहीं,
बल्कि उस दोपहर की खुशबू है,
जहाँ बादल, हवा और मेरे गीले बाल—
तीनों ने मिलकर
मेरे हृदय में
एक मधुर-सी हलचल जगा दी थी
और एक साधारण-से क्षण को
जीवन भर की स्मृति में बदल दिया था।
वह स्मृति आज भी
हवा के किसी झोंके के साथ
चुपचाप लौट आती है।
कवि: दिनेश नागर
केशवरायपाटन, राजस्थान।
https://www.anubbutisevimarshtak.com/2026/06/band-darwaze-par-aakhiri-ummeed.html
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