बंद दरवाज़े पर आख़िरी उम्मीद
बंद दरवाज़े पर आख़िरी उम्मीद
मैं कब से दरवाज़ा खटखटा रही हूँ,
आप ताला ही नहीं खोल रहे हैं...
यूँ खुद को मुझसे दूर कर लेना,
क्या सच में सज़ा मुझे दे रहे हैं?
या अपने ही दिल को
चुपचाप तोड़ रहे हैं...
थोड़ा भरोसा मुझ पर भी कर लीजिए,
ये बंद रास्ता
बस एक बार खुलने दीजिए,
मेरी आवाज़ को फिर से
आप तक आने दीजिए...
रास्ता खुलेगा तो
बस दो आँसू बहेंगे,
कुछ सच्ची बातें होंगी,
कुछ अनकहे सवाल होंगे,
और शायद उन्हीं के सहारे
हम फिर से पहले जैसे हो जाएँ...
वरना ये जो खामोशी है ना,
ये मुझे अंदर ही अंदर खा रही है।
हर दिन ऐसा लगता है,
जैसे आपकी दुनिया से
मेरा नाम थोड़ा और मिट रहा हो...
एक तरफ होती तो
सह भी लेती,
पर ये फ़ासला
अब दोनों किनारों तक कैसे पहुँच गया है?
मैंने तो हर कोशिश की थी,
कि जब भी आप सामने आओ,
मैं सब सच बता दूँ,
कुछ भी अधूरा न रह जाए...
मैंने कई बार दस्तक दी,
कई बार हिम्मत जुटाई,
पर मेरी हर आहट
खामोशी की दीवार से लौट आई...
पर शायद किस्मत को
ये मंज़ूर नहीं था,
मेरी हर कोशिश
राहों में कहीं खो गई,
और जो डर था दिल में,
वही सच बनकर रह गया...
फिर भी एक उम्मीद
अब तक बाकी है,
कि शायद किसी दिन
आप इस खामोशी को सुनेंगे,
और मेरी ख़ामोशी के पीछे
छिपी विवशता को पहचानेंगे...
बस एक बार...
ये ताला खोल दीजिए,
मेरी दस्तक को
फिर से सुन लीजिए...
मैं कोई शिकायत नहीं करूँगी,
कोई हिसाब नहीं माँगूँगी,
सिर्फ़ दिल की वो बातें कहूँगी
जो अब तक कह नहीं पाई...
और अगर अब भी
मेरी कोई बात
आप तक पहुँचती हो,
तो इस बंद चौखट को
आख़िरी बार खुलने दीजिए...
मैं सिर्फ़ आपको
फिर से अपना कहने आई हूँ...
क्योंकि उम्मीद अभी भी
दहलीज़ पर खड़ी है,
थकी हुई, मगर ज़िंदा...
और इंतज़ार कर रही है
कि एक दिन
खामोशी की ये दीवार गिरेगी,
फ़ासलों की ये धुंध छँटेगी,
और शायद उस दिन
कोई शिकायत नहीं बचेगी...
सिर्फ़ इतना एहसास रहेगा—
कि बंद था दरवाज़ा,
मगर उम्मीद ने
कभी लौटना नहीं सीखा...।
लेखक: दिनेश नागर
केशवरायपाटन, राजस्थान।
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