'दोस्ती में ज़िंदगी, ज़िंदगी में दोस्ती' : कोरोना-काल में मित्रता और मानवीय संवेदनाओं की मार्मिक कहानी (प्रो. शमा खान की कहानी का समीक्षात्मक पाठ)
'दोस्ती में ज़िंदगी, ज़िंदगी में दोस्ती' : कोरोना-काल में मित्रता और मानवीय संवेदनाओं की मार्मिक कहानी (प्रो. शमा खान की कहानी का समीक्षात्मक पाठ) दिनेश नागर स्वतंत्र साहित्य-चिंतक केशवरायपाटन, राजस्थान। समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में प्रो. शमा खान की कहानियाँ मानवीय संवेदनाओं और जीवनानुभवों पर आधारित सशक्त कथा-दृष्टि का परिचय देती हैं। उनकी रचनाओं में जीवन का यथार्थ जितनी प्रामाणिकता के साथ उभरता है, उतनी ही गहराई से मनुष्यता और आत्मीयता भी अभिव्यक्त होती है। यही गुण उनकी कहानी 'दोस्ती में ज़िंदगी, ज़िंदगी में दोस्ती' को विशिष्ट बनाता है। कोरोना महामारी की पृष्ठभूमि में रची गई यह कहानी केवल एक त्रासदी का आख्यान नहीं, बल्कि मित्रता, प्रेम, पारिवारिक आत्मीयता और जीवन के प्रति अडिग विश्वास की मार्मिक अभिव्यक्ति भी है। कहानी का आरंभ अपने दार्शनिक स्वर के कारण तुरंत ध्यान आकर्षित करता है। लेखिका लिखती हैं— "दोस्तों में ज़िंदगी है और उन्हीं की संगत में 'ईरम' की खुशबू।" यहाँ 'ईरम' स्वर्गीय आनंद और दिव्य सौंदर्य का प्रतीक है। इस एक पंक्ति के माध्यम से ...