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सपनों का नोटिफिकेशन

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सपनों का नोटिफिकेशन कवि : दिनेश नागर, राजस्थान आज स्वप्न-आकाश में आपके नाम का एक ताज़ा नोटिफिकेशन चमक उठा। सोचा— कितने दिन हो गए, आपकी टाइपिंग के वे धड़कते हुए तीन डॉट्स देखे हुए... तो क्यों न यादों की चैट एक बार फिर खोली जाए, दिल की इनबॉक्स में आपको सबसे ऊपर पिन कर दिया जाए— प्यार से... क्या पता— सपनों का नेटवर्क जुड़ जाए... और आपकी कोई मुस्कान मेरे मन की स्क्रीन पर धीरे-से उभर आए। तब हर सुबह आपकी याद का एक नया संदेश मिले, और आपकी मुस्कान मेरे जीवन का सबसे ख़ूबसूरत नोटिफिकेशन बन जाए। https://www.anubbutisevimarshtak.com/2026/06/vishwas-ka-andhpradesh-poem-dinesh-nagar.html  विश्वास का अंधप्रदेश  https://www.anubbutisevimarshtak.com/2026/06/kavi-dinesh-nagar-geele-baalon-ka-vah-kshan.html  गीले बालों का वह क्षण  https://www.anubbutisevimarshtak.com/2026/06/maa-ki-chhaya-kavita-dinesh-nagar.html  माँ की छाया https://www.anubbutisevimarshtak.com/2026/06/band-darwaze-par-aakhiri-ummeed.html बंद दरवाज़े पर आख़िर उम्मीद 

विश्वास का अंधप्रदेश

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विश्वास का अंधप्रदेश लेखक: दिनेश नागर, राजस्थान। दिन में वह प्रतीत होता है मानो आकाश की निर्मल आभा— शांत, सौम्य और भीतर से आलोकित, एक मद्धिम उजास, जो मन को क्षणभर छूकर निस्तब्धता में विलीन हो जाता है। परंतु रात्रि में उसका स्वभाव बदल उठता है। जब मैं निद्रा में डूबा होता हूँ, उसकी अनाम हलचलें मेरे अंतरमन की शांति को विचलित कर जाती हैं। तब मैं निःशब्द छत पर चला जाता हूँ, जहाँ मुक्त वायु बहती है, तारों की निस्तब्ध छटा तले मैं स्मृतियों में अपनी प्रेयसी को संजो लेता हूँ। कभी उसे फ़ोन करता हूँ— पर घंटियों की गूँज अनसुनी रह जाती है। फिर भी उसकी स्मृति मेरी थकी हुई आत्मा पर शीतल स्पर्श-सी शांति बिखेर देती है। रात्रि का गहन तम मुझे एकाकी कर देता है; पर निस्तब्ध गगन की छाँह में मन को क्षणमात्र विराम मिल जाता है। विचारों का मंथन गहराता है— और उसी गहराई से कविता का शिल्प आकार लेने लगता है... दिन के उजाले में भी मेरी चेतना यह जानती है— कार्यस्थल पर, जहाँ कोई उलझन हो, वह प्रायः इतना कहता है— "अपने क्या प्रयोजन है?" और फिर सर्वहित का भाव धीरे-धीरे मौन में विलीन हो जाता है। इसीलिए मेरी स्के...

माँ की छाया

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माँ की छाया — दिनेश नागर, राजस्थान। आज घोंसले पर सन्नाटे ने पंख पसार दिए हैं। दो नन्ही आँखें अब भी आकाश टटोल रही हैं। एक क्रूर छलाँग पंखों तले सिमटी ममता की पूरी दुनिया उजाड़ गई। पिता की व्याकुल उड़ान देर तक आकाश में भटकती रही। पंखों से लड़ा, चोंच से वार किया... फिर घोंसला चुप हो गया। दो नन्हे प्राण घोंसले में सिमटे हैं। आँखों में एक ही प्रश्न— "माँ, तुम कहाँ गई?" हवा भी आज धीमे-धीमे चल रही है। शायद उसने भी इन नन्ही आँखों की व्यथा छू ली हो। और मैं... एक पल की देरी अब भी हृदय में काँटे-सी चुभ रही है। मैंने घोंसले के चारों ओर जाली का एक पहरा खड़ा कर दिया है— जैसे किसी छोटे-से देश ने अपनी सीमाओं पर अंतिम पहरा बिठा दिया हो। कि अब कोई क्रूर पंजा इन नन्हे पंखों तक न पहुँच सके। शायद मनुष्यता यही है— जहाँ जीवन काँप रहा हो, वहाँ एक सहारा बन जाना। और प्रकृति की गोद में आशा अब भी बाकी है। शायद पिता फिर सँभल जाए और इन नन्हे पंखों को उड़ना सिखा दे। कभी-कभी एक छोटा-सा घोंसला पूरे संसार की कथा कह जाता है। अब... रात का अँधकार चुपचाप बीत गया। मैंने दाना रखा, पानी रखा— फिर पिता की आहट सुनता रह...

पथ अभी शेष है

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पथ अभी शेष है अगर आज पथ पर आघात मिला है, तो समझो यात्रा का पथ अभी शेष है। जो व्यक्ति तुम्हारा होकर भी दूर चला गया, शायद उसकी नियति कहीं और लिखी थी। यदि आकांक्षाएँ अधूरी रह गई हों, फिर भी उम्मीदों को मौन मत होने दो, हर कथा का पूर्ण होना आवश्यक नहीं, कुछ अध्यायों को स्मृतियों में अमर होने दो। जब मन बार-बार प्रश्न करे— "अभाव मेरे हिस्से में ही क्यों आया?" तब उन चेहरों को याद करना, जिन्होंने आँधियों में भी मुस्कान सजाई है। यदि हृदय में पीड़ा का अथाह सागर है, तो उसे शब्दों की धारा बनने दो, और यदि सुख की कोई सरिता फूटी है, तो उसे अपनों के आँगन तक बहने दो। जब समय प्रतिकूल प्रतीत हो, तो व्यर्थ समय से युद्ध मत करना, क्योंकि घने बादलों की भी एक सीमा होती है, और क्षितिज पर सूर्य पुनः उग आता है। रोटी, छत और अपनों का साथ हो, तो शिकायतों का भार हल्का कर दो, जीवन कभी पूर्ण न्याय का वचन नहीं देता, तुम बस संघर्षों में भी जीने की कला अर्जित कर लो। जो छिन गया, उसे प्रारब्ध का निर्णय मान लो, जो प्राप्त हुआ, उसे ईश्वर का प्रसाद जान लो, और जो अभी भविष्य के गर्भ में है, उसके स्वागत में विश्वास की ल...

ढोला-मारू : एक अमर प्रेम कथा

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  ढोला-मारू : एक अमर प्रेम कथा राजस्थान की लोककथाओं में अनेक प्रेमगाथाएँ प्रचलित हैं, किंतु उनमें ढोला-मारू की प्रेमकथा सर्वाधिक लोकप्रिय और जनप्रिय मानी जाती है। इसकी लोकप्रियता का अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि लोकमान्यता के अनुसार सदियों पुरानी यह प्रेमगाथा आज भी जनमानस में समान रूप से जीवित है। राजस्थान में सुंदर दांपत्य युगल की तुलना प्रायः ढोला-मारू से की जाती है। इतना ही नहीं, लोकगीतों में स्त्रियाँ अपने प्रियतम अथवा पति को स्नेहपूर्वक ‘ढोला’ कहकर संबोधित करती हैं। इस प्रकार ‘ढोला’ शब्द पति का पर्याय-सा बन गया है। ग्रामीण अंचलों में विभिन्न उत्सवों और मांगलिक अवसरों पर ढोला-मारू के गीत आज भी बड़े चाव और अनुराग के साथ गाए जाते हैं। लोकपरंपरा के अनुसार ढोला, नरवर के राजा नल का पुत्र था, जिसे साल्हकुमार अथवा ढोला के नाम से जाना जाता है। उसका विवाह बाल्यावस्था में जांगलदेश (वर्तमान बीकानेर क्षेत्र) के पूंगल राज्य के शासक पंवार राजा पिंगल की पुत्री मारवणी (मारू) से हुआ था। उस समय ढोला मात्र तीन वर्ष का और मारवणी लगभग डेढ़ वर्ष की थी। अल्पायु होने के कारण विवाह के उपरांत म...

गीले बालों का वह क्षण

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                    गीले बालों का वह क्षण आज भी स्मृति में है  वह दोपहर, जो निराली थी। सूर्य बादलों की ओट में था और मंद शीतल हवा बह रही थी। कॉलेज परिसर में— लंच ब्रेक का धीमा-सा स्वर, बेंचों पर रखी किताबों की हल्की-सी गंध, और वही हवा— जो मेरे गीले बालों से खेल रही थी। मैंने सिर झुकाकर उन्हें सँभालना चाहा, पर वह हवा— मानो किसी प्रिय की उँगलियाँ धीरे-धीरे बालों में फिर रही हों। उस स्पर्श में एक अनकहा सुकून था, किसी भूली-बिसरी स्मृति की आहट भी। भीतर तक उतर आई थी वह नमी— सिर्फ बालों में नहीं, मन में भी। तभी सखियों की हँसी गूँजी— "रुक, तेरी तस्वीर खींचते हैं!" मैंने झट से बाल सँवार लिए, होठों पर हल्की-सी मुस्कान खिल उठी, और वह पल ठहर गया— कैमरे में नहीं, हृदय में। अब जब वह तस्वीर देखती हूँ, तो लगता है— वह कोई साधारण तस्वीर नहीं, बल्कि उस दोपहर की खुशबू है, जहाँ बादल, हवा और मेरे गीले बाल— तीनों ने मिलकर मेरे हृदय में एक मधुर-सी हलचल जगा दी थी और एक साधारण-से क्षण को जीवन भर की स्मृति में बदल दिया था। वह स्मृति आज भी हवा के किसी झोंक...

बंद दरवाज़े पर आख़िरी उम्मीद

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  बंद दरवाज़े पर आख़िरी उम्मीद मैं न जाने कब से इस बंद दरवाज़े पर खड़ी हूँ, मगर आप मेरी पुकार तक को सुनने से इनकार कर रहे हैं… क्यों यूँ धीरे-धीरे मुझसे दूर होते जा रहे हैं? क्या यह सज़ा सच में सिर्फ़ मुझे मिल रही है? या आप भी अपने ही दिल को चुपचाप तोड़ते जा रहे हैं… थोड़ा भरोसा मुझ पर भी कर लीजिए, यह बंद रास्ता बस एक बार खुलने दीजिए, मेरी आवाज़ को फिर से आप तक आने दीजिए… रास्ता खुलेगा तो बस दो आँसू बहेंगे, कुछ सच्ची बातें होंगी, कुछ अनकहे सवाल होंगे, और शायद उन्हीं के सहारे हम फिर से पहले जैसे हो सकें… वरना यह जो खामोशी है ना, यह मुझे भीतर ही भीतर तोड़ रही है। हर दिन ऐसा लगता है, जैसे आपकी दुनिया से मेरा नाम मिटता जा रहा है… एक तरफ होती तो सह भी लेती, पर यह फ़ासला अब दोनों किनारों तक कैसे पहुँच गया है? मैंने तो हर कोशिश की थी, कि जब भी आप सामने आएँ, मैं सब सच बता दूँ, कुछ भी अधूरा न रह जाए… मैंने कई बार दस्तक दी, कई बार हिम्मत जुटाई, पर मेरी हर आहट खामोशी की दीवार से लौट आई… फिर भी एक उम्मीद अब तक शेष है, कि शायद किसी दिन आप इस खामोशी को सुनेंगे, और मेरी ख़ामोशी के पीछे छिपी विवशत...

कामायनी : प्रश्न–उत्तर एवं व्याख्या (जयशंकर प्रसाद कृत)

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                     कामायनी : प्रश्न–उत्तर एवं व्याख्या (जयशंकर प्रसाद कृत) चिंता और श्रद्धा सर्ग के विशेष संदर्भ में     1. ‘कामायनी’ को छायावाद का उपनिषद् किसने कहा है? (1) शान्तिप्रिय द्विवेदी                         (2) मुक्तिबोध (3) निराला                                (4) रामचंद्र शुक्ल उत्तर : (1) व्याख्या : शान्तिप्रिय द्विवेदी ने ‘कामायनी’ को छायावाद का उपनिषद् कहा है।   मुक्तिबोध ने इसे फैंटेसी कहा।  महाप्राण निराला ने इसे रहस्यवाद का प्रथम महाकाव्य माना। डॉ. नगेन्द्र ने इसे मानव चेतना के विकास का महाकाव्य कहा है तथा दिनकर ने इसे दोषरहित एवं दोषसहित रचना माना है। 2. ‘कामायनी’ के संदर्भ में असंगत कथन है— (1) कर्म का संदेश और वैराग्य मत का खण्डन (2) अभेदमूलक अद्वैतवाद का शंखनाद (3) शाश्वत जीवन और मानुष-कल्याण का काव्य (4) मानवीय संवेगों का उदात्तीकरण नहीं उत्तर...

“मेरी शारदीय!” : प्रेम और आत्मानुभूति की काव्यात्मक अभिव्यक्ति — प्रो. शमा खान के काव्य-संग्रह के संदर्भ में

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“मेरी शारदीय!” : प्रेम और आत्मानुभूति की काव्यात्मक अभिव्यक्ति —  प्रो. शमा खान के काव्य-संग्रह के संदर्भ में दिनेश नागर समीक्षक एवं स्वतंत्र साहित्य-चिंतक          केशवरायपाटन, राजस्थान। कविता मनुष्य की उन सूक्ष्मतम अनुभूतियों की अभिव्यक्ति है, जिन्हें साधारण भाषा पूर्णतः व्यक्त नहीं कर पाती। जब संवेदनाएँ आत्मा की गहराइयों में उतरकर शब्दों का रूप ग्रहण करती हैं, तब काव्य केवल साहित्य नहीं रहता, बल्कि वह मनुष्य के अंतर्जगत का आलोक बन जाता है। प्रेम और आत्मानुभूति की इसी काव्यात्मक भावभूमि पर प्रो. शमा खान का काव्य-संग्रह “मेरी शारदीय!” अपनी विशिष्ट उपस्थिति दर्ज कराता है। उनकी कविताएँ मनुष्य के भीतर स्पंदित होने वाली उन कोमल भाव-तरंगों को स्वर देती हैं, जिनमें प्रेम केवल संबंध नहीं, बल्कि आत्मा का विस्तार बनकर उपस्थित होता है। इस संग्रह की कविताएँ प्रेम, प्रकृति और आत्मिक चेतना का एक ऐसा सौन्दर्यमय संसार रचती है, जहाँ भावुकता की अपेक्षा संवेदना की गहराई अधिक दिखाई देती है। कवयित्री की दृष्टि बाह्य जगत से अधिक अंतर्मन की सूक्ष्म अनुभूतियों पर केंद्रित है। य...