संदेश

गीले बालों का वह क्षण

    गीले बालों का वह क्षण आज भी स्मृति में वह दोपहर निराली थी। सूर्य बादलों की ओट में था, और मंद शीतल हवा बह रही थी। कॉलेज परिसर में— लंच ब्रेक का धीमा-सा स्वर, बेंचों पर रखी किताबों की हल्की-सी गंध, और वही हवा— जो मेरे गीले बालों से खेल रही थी। मैंने उन्हें झुकाकर सुखाना चाहा, पर वह हवा— मानो किसी प्रिय की उँगलियाँ धीरे-धीरे बालों में फिर रही हों। उस स्पर्श में एक अनकहा सुकून था, एक अनजानी स्मृति की आहट भी। भीतर तक उतर आई थी वह नमी— सिर्फ बालों में नहीं, आँखों में भी। तभी सखियों की हँसी गूँजी— "रुको, तुम्हारी तस्वीर खींचते हैं!" मैंने झट से बाल सँवार लिए, मुख पर मंद मुस्कान सजा ली, और वह पल ठहर गया— कैमरे में नहीं, हृदय में। अब जब वह तस्वीर देखती हूँ, तो लगता है— वह कोई साधारण तस्वीर नहीं, बल्कि उस दोपहर की खुशबू है, जहाँ बादल, हवा और बाल— तीनों ने मिलकर मेरे भीतर की खामोशी को छू लिया था, और एक साधारण-से क्षण को स्मृति में बदल दिया, जो आज भी हवा के किसी झोंके के साथ चुपचाप लौट आता है। लेखक: दिनेश नागर   केशवरायपाटन, राजस्थान।   https://www.anubbutisevimarshtak.com/2...

बंद दरवाज़े पर आख़िरी उम्मीद

  बंद दरवाज़े पर आख़िरी उम्मीद मैं कब से दरवाज़ा खटखटा रही हूँ, आप ताला ही नहीं खोल रहे हैं... यूँ खुद को मुझसे दूर कर लेना, क्या सच में सज़ा मुझे दे रहे हैं? या अपने ही दिल को चुपचाप तोड़ रहे हैं... थोड़ा भरोसा मुझ पर भी कर लीजिए, ये बंद रास्ता बस एक बार खुलने दीजिए, मेरी आवाज़ को फिर से आप तक आने दीजिए... रास्ता खुलेगा तो बस दो आँसू बहेंगे, कुछ सच्ची बातें होंगी, कुछ अनकहे सवाल होंगे, और शायद उन्हीं के सहारे हम फिर से पहले जैसे हो जाएँ... वरना ये जो खामोशी है ना, ये मुझे अंदर ही अंदर खा रही है। हर दिन ऐसा लगता है, जैसे आपकी दुनिया से मेरा नाम थोड़ा और मिट रहा हो... एक तरफ होती तो सह भी लेती, पर ये फ़ासला अब दोनों किनारों तक कैसे पहुँच गया है? मैंने तो हर कोशिश की थी, कि जब भी आप सामने आओ, मैं सब सच बता दूँ, कुछ भी अधूरा न रह जाए... मैंने कई बार दस्तक दी, कई बार हिम्मत जुटाई, पर मेरी हर आहट खामोशी की दीवार से लौट आई... पर शायद किस्मत को ये मंज़ूर नहीं था, मेरी हर कोशिश राहों में कहीं खो गई, और जो डर था दिल में, वही सच बनकर रह गया... फिर भी एक उम्मीद अब तक बाकी है, कि शायद किसी दिन...

📖 कामायनी : प्रश्न–उत्तर एवं व्याख्या (जयशंकर प्रसाद कृत)

📖 कामायनी : प्रश्न–उत्तर एवं व्याख्या (जयशंकर प्रसाद कृत) चिंता और श्रद्धा सर्ग के विशेष संदर्भ में 1. ‘कामायनी’ को छायावाद का उपनिषद् किसने कहा है?           (1) शान्तिप्रिय द्विवेदी (2) मुक्तिबोध (3) निराला (4) रामचंद्र शुक्ल उत्तर : (1) शान्तिप्रिय द्विवेदी व्याख्या : शान्तिप्रिय द्विवेदी ने ‘कामायनी’ को छायावाद का उपनिषद् कहा है। मुक्तिबोध ने इसे फैंटेसी कहा। महाप्राण निराला ने इसे रहस्यवाद का प्रथम महाकाव्य माना। डॉ. नगेन्द्र ने इसे मानव चेतना के विकास का महाकाव्य कहा है तथा दिनकर ने इसे दोषरहित एवं दोषसहित रचना माना है। 2. ‘कामायनी’ के संदर्भ में असंगत कथन है— (1) कर्म का संदेश और वैराग्य मत का खण्डन (2) अभेदमूलक अद्वैतवाद का शंखनाद (3) शाश्वत जीवन और मानुष-कल्याण का काव्य (4) मानवीय संवेगों का उदात्तीकरण नहीं उत्तर : (4 ) व्याख्या : ‘ कामायनी’ में मानवीय भावनाओं और संवेगों का अत्यन्त उच्च स्तर पर उदात्तीकरण हुआ है। अतः चौथा कथन असंगत है। जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ अद्वैतवाद और मानव-कल्याण की भावना का महाकाव्य है। यह काव्य-रचना वैराग्य मत का खण्डन कर कर्...

“मेरी शारदीय!” : प्रेम और आत्मानुभूति की काव्यात्मक अभिव्यक्ति — प्रो. शमा खान के काव्य-संग्रह के संदर्भ में

“मेरी शारदीय!” : प्रेम और आत्मानुभूति की काव्यात्मक अभिव्यक्ति —  प्रो. शमा खान के काव्य-संग्रह के संदर्भ में आलोचक : दिनेश नागर                केशवरायपाटन, राजस्थान। कविता मनुष्य की उन सूक्ष्मतम अनुभूतियों की अभिव्यक्ति है, जिन्हें साधारण भाषा पूर्णतः व्यक्त नहीं कर पाती। जब संवेदनाएँ आत्मा की गहराइयों में उतरकर शब्दों का रूप ग्रहण करती हैं, तब काव्य केवल साहित्य नहीं रहता, बल्कि वह मनुष्य के अंतर्जगत का आलोक बन जाता है। प्रेम और आत्मानुभूति की इसी काव्यात्मक भावभूमि पर प्रो. शमा खान का काव्य-संग्रह “मेरी शारदीय!” अपनी विशिष्ट उपस्थिति दर्ज कराता है। उनकी कविताएँ मनुष्य के भीतर स्पंदित होने वाली उन कोमल भाव-तरंगों को स्वर देती हैं, जिनमें प्रेम केवल संबंध नहीं, बल्कि आत्मा का विस्तार बनकर उपस्थित होता है। इस संग्रह की कविताएँ प्रेम, प्रकृति और आत्मिक चेतना का एक ऐसा सौन्दर्यमय संसार रचती है, जहाँ भावुकता की अपेक्षा संवेदना की गहराई अधिक दिखाई देती है। कवयित्री की दृष्टि बाह्य जगत से अधिक अंतर्मन की सूक्ष्म अनुभूतियों पर केंद्रित है। यही कार...

🏜️📜 राजस्थानी भाषा : वर्गीकरण, प्रमुख बोलियाँ एवं विशेषताएँ

  🏜️📜 राजस्थानी भाषा : वर्गीकरण, प्रमुख बोलियाँ एवं विशेषताएँ राजस्थानी भाषा राजस्थान की सांस्कृतिक आत्मा का वह सजीव स्वर है, जिसमें मरुस्थल की लय 🏜️, इतिहास की गूँज 📜 और लोकजीवन की सूक्ष्म अनुभूतियाँ एक साथ प्रवाहित होती हैं। यह केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि वीरगाथाओं की तेजस्विता ⚔️, लोकगीतों की मधुरता 🎶, परम्पराओं की गरिमा तथा जनमानस की भावनाओं का प्रखर वाहक है। मारवाड़ी, मेवाड़ी, हाड़ौती, शेखावटी आदि बोलियों के समन्वय से राजस्थानी भाषा ‘विविधता में एकता’ का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करती है। 📚 राजस्थानी भाषा का वर्गीकरण राजस्थानी भाषा की बहुविध प्रकृति के कारण विभिन्न भाषाविदों ने इसके अनेक वर्गीकरण प्रस्तुत किए हैं— 1️⃣ सर जॉर्ज ग्रियर्सन का वर्गीकरण ( Linguistic Survey of India) पश्चिमी राजस्थानी — मारवाड़ी उत्तरी-पूर्वी राजस्थानी — मेवाती, अहीरवाटी मध्य-पूर्वी राजस्थानी — ढूँढाड़ी, हाड़ौती दक्षिण-पूर्वी राजस्थानी — मालवी, रांगड़ी दक्षिणी राजस्थानी — निमाड़ी 2️⃣ डॉ. टेसीतोरी का वर्गीकरण पश्चिमी राजस्थानी पूर्वी राजस्थानी 3️⃣ नरोत्तम स्वामी का वर्गीकरण पश्चिमी राजस्थ...

“भारतीय ज्ञान परंपरा वर्तमान समय में उपयोगी है।” (विषय—विपक्ष)

“भारतीय ज्ञान परंपरा वर्तमान समय में उपयोगी है।”                       (विषय—विपक्ष) ✍️ दिनेश नागर, राजस्थान।    “विरासतें सर पर सजती हैं, पर रास्ते कदमों से बनते हैं,      बीता हुआ कल सीख देता है—पर मंज़िलें आज से बनती हैं।”   मैं माँ शारदा को नमन करता हूँ।  आदरणीय मंच, माननीय निर्णायकगण,  उपस्थित विद्वतजन  और मेरे साथियों को ससम्मान प्रणाम।   आज मैं इस प्रस्ताव — “भारतीय ज्ञान परंपरा वर्तमान समय में उपयोगी है” — के पूरी तरह विपक्ष में खड़ा हूँ। 🎙️ प्रस्तावना (स्पष्ट विपक्षीय दृष्टिकोण) भारतीय ज्ञान परंपरा निस्संदेह गौरवशाली है, पर गौरवशाली होना और वर्तमान समय में व्यावहारिक रूप से उपयोगी होना—दो बिल्कुल अलग बातें हैं। 21वीं सदी की दुनिया AI, रोबोटिक्स, साइबर सुरक्षा, क्वांटम कंप्यूटिंग, बायोटेक्नोलॉजी और जेनेटिक इंजीनियरिंग जैसी अत्याधुनिक चुनौतियों से भरी है। इन समस्याओं के समाधान— प्राचीन शास्त्रों, धर्मग्रंथों, सूत्रों या मंत्रों में उपलब्ध नहीं मिलते। आज की ज़रूरत परंपरा...

रीतिकाल का नामकरण

       रीतिकाल का नामकरण रीतिकाल के नामकरण को लेकर विद्वानों में पर्याप्त मतभेद रहे हैं। विभिन्न आचार्यों ने इस काल की प्रवृत्तियों, काव्य–धारा और विषयवस्तु को आधार बनाकर इसे अलग-अलग संज्ञाओं से अभिहित किया है। नीचे प्रमुख मतों का विवेचन प्रस्तुत है— 1. अलंकृत काल मिश्रबंधुओं ने रीतिकाल को ‘अलंकृत काल’ कहा है। उनका मत था कि इस युग की कविता में अलंकारों की प्रमुखता है और कवियों का ध्यान काव्य को सजाने-संवारने में अधिक लगा रहता था। परंतु यह तर्क सर्वथा स्वीकार्य नहीं है। अलंकरण इस युग की एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति अवश्य है, किन्तु अकेली सर्वव्यापक प्रवृत्ति नहीं। अन्य काव्यांगों—भाव, अनुभूति, भाषा—को भी पर्याप्त स्थान प्राप्त था। साथ ही, इस काल में ऐसे कवि भी हुए जिन्होंने अलंकरण की अपेक्षा भावपक्ष को प्रधानता दी—जैसे आलम, बोधा, घनानंद आदि स्वच्छंद धारा के रचनाकार। अतः केवल अलंकार-प्रधानता के आधार पर नामकरण उचित नहीं ठहरता। 2. शृंगारकाल पं. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने इस युग की शृंगार-प्रधान रचनाओं को आधार बनाकर इसे ‘शृंगारकाल’ कहा। निस्संदेह, अधिकांश रचनाएँ शृंगारिक हैं, पर...