विश्वास का अंधप्रदेश




विश्वास का अंधप्रदेश

लेखक: दिनेश नागर, राजस्थान।



दिन में
वह प्रतीत होता है
मानो आकाश की निर्मल आभा—
शांत, सौम्य और भीतर से आलोकित,
एक मद्धिम उजास,
जो मन को क्षणभर छूकर
निस्तब्धता में विलीन हो जाता है।

परंतु रात्रि में
उसका स्वभाव बदल उठता है।
जब मैं निद्रा में डूबा होता हूँ,
उसकी अनाम हलचलें
मेरे अंतरमन की शांति को
विचलित कर जाती हैं।

तब मैं निःशब्द छत पर चला जाता हूँ,
जहाँ मुक्त वायु बहती है,
तारों की निस्तब्ध छटा तले
मैं स्मृतियों में
अपनी प्रेयसी को संजो लेता हूँ।

कभी उसे फ़ोन करता हूँ—
पर घंटियों की गूँज
अनसुनी रह जाती है।
फिर भी उसकी स्मृति
मेरी थकी हुई आत्मा पर
शीतल स्पर्श-सी शांति बिखेर देती है।

रात्रि का गहन तम
मुझे एकाकी कर देता है;
पर निस्तब्ध गगन की छाँह में
मन को क्षणमात्र विराम मिल जाता है।

विचारों का मंथन गहराता है—
और उसी गहराई से
कविता का शिल्प आकार लेने लगता है...

दिन के उजाले में भी
मेरी चेतना यह जानती है—
कार्यस्थल पर,
जहाँ कोई उलझन हो,
वह प्रायः इतना कहता है—
"अपने क्या प्रयोजन है?"

और फिर
सर्वहित का भाव
धीरे-धीरे मौन में विलीन हो जाता है।

इसीलिए
मेरी स्केच-बुक के पृष्ठों पर
उसकी छवि बार-बार उभरती है,
फिर धुँधली हो जाती है।
क्योंकि उसके असंख्य गुणों पर
उसका अल्प-सा स्वार्थ
रबर-सा फिर जाता है।

अब यही प्रश्न रह जाता है—
अंधकार मेरी रात्रि में था,
या उसकी आत्मा के
गहन गलियारों में?



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