गीले बालों का वह क्षण
गीले बालों का वह क्षण
आज भी स्मृति में
वह दोपहर निराली थी।
सूर्य बादलों की ओट में था,
और मंद शीतल हवा बह रही थी।
कॉलेज परिसर में—
लंच ब्रेक का धीमा-सा स्वर,
बेंचों पर रखी किताबों की हल्की-सी गंध,
और वही हवा—
जो मेरे गीले बालों से खेल रही थी।
मैंने उन्हें झुकाकर सुखाना चाहा,
पर वह हवा—
मानो किसी प्रिय की
उँगलियाँ धीरे-धीरे बालों में फिर रही हों।
उस स्पर्श में
एक अनकहा सुकून था,
एक अनजानी स्मृति की आहट भी।
भीतर तक उतर आई थी वह नमी—
सिर्फ बालों में नहीं, आँखों में भी।
तभी सखियों की हँसी गूँजी—
"रुको, तुम्हारी तस्वीर खींचते हैं!"
मैंने झट से बाल सँवार लिए,
मुख पर मंद मुस्कान सजा ली,
और वह पल ठहर गया—
कैमरे में नहीं, हृदय में।
अब जब वह तस्वीर देखती हूँ,
तो लगता है—
वह कोई साधारण तस्वीर नहीं,
बल्कि उस दोपहर की खुशबू है,
जहाँ बादल, हवा और बाल—
तीनों ने मिलकर
मेरे भीतर की खामोशी को
छू लिया था,
और एक साधारण-से क्षण को
स्मृति में बदल दिया,
जो आज भी
हवा के किसी झोंके के साथ
चुपचाप लौट आता है।
लेखक: दिनेश नागर
केशवरायपाटन, राजस्थान।
https://www.anubbutisevimarshtak.com/2026/06/band-darwaze-par-aakhiri-ummeed.html
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