रीतिकाल का नामकरण

    

 रीतिकाल का नामकरण


रीतिकाल के नामकरण को लेकर विद्वानों में पर्याप्त मतभेद रहे हैं। विभिन्न आचार्यों ने इस काल की प्रवृत्तियों, काव्य–धारा और विषयवस्तु को आधार बनाकर इसे अलग-अलग संज्ञाओं से अभिहित किया है। नीचे प्रमुख मतों का विवेचन प्रस्तुत है—


1. अलंकृत काल


मिश्रबंधुओं ने रीतिकाल को ‘अलंकृत काल’ कहा है। उनका मत था कि इस युग की कविता में अलंकारों की प्रमुखता है और कवियों का ध्यान काव्य को सजाने-संवारने में अधिक लगा रहता था।

परंतु यह तर्क सर्वथा स्वीकार्य नहीं है। अलंकरण इस युग की एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति अवश्य है, किन्तु अकेली सर्वव्यापक प्रवृत्ति नहीं। अन्य काव्यांगों—भाव, अनुभूति, भाषा—को भी पर्याप्त स्थान प्राप्त था।

साथ ही, इस काल में ऐसे कवि भी हुए जिन्होंने अलंकरण की अपेक्षा भावपक्ष को प्रधानता दी—जैसे आलम, बोधा, घनानंद आदि स्वच्छंद धारा के रचनाकार। अतः केवल अलंकार-प्रधानता के आधार पर नामकरण उचित नहीं ठहरता।


2. शृंगारकाल


पं. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने इस युग की शृंगार-प्रधान रचनाओं को आधार बनाकर इसे ‘शृंगारकाल’ कहा।

निस्संदेह, अधिकांश रचनाएँ शृंगारिक हैं, परंतु इनका प्रमुख उद्देश्य आश्रयदाताओं को प्रसन्न करना था, न कि कवियों की व्यक्तिगत काम-वासना। यही कारण है कि कई कवि अपनी इस प्रवृत्ति से संतुष्ट भी नहीं थे। भिखारीदास ने कहा—


      “आगे के कवि रीझि हैं, तो कबिताई न तौ,

        राधिका-कन्हाई सुमिरन कौ बहानौ है॥” — काव्यनिर्णय

साथ ही, यदि इसे ‘शृंगारकाल’ मान भी लिया जाए, तो वीर, भक्ति आदि रसों में रचे महत्त्वपूर्ण ग्रंथ इस सीमा में नहीं समा पाते। इसलिए यह संज्ञा संकीर्ण मानी जाती है।


3. कलाकाल


डॉ. रमाशंकर शुक्ल ‘रसाल’ ने कलापक्ष की प्रबलता के आधार पर इसे ‘कलाकाल’ कहा है।

किन्तु रीतिकालीन काव्य में कला के साथ-साथ भाव की भी समान महत्ता है। केवल कला-प्रधानता को आधार बनाकर नामकरण कर देना भावपक्ष की उपेक्षा होगी; अतः यह संज्ञा भी पूर्णतः उपयुक्त नहीं है।


4. रीतिकाल


आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इस युग को ‘रीतिकाल’ नाम दिया, जो सर्वाधिक तर्कसंगत माना गया है।

कारण—इस समय रीति-संबंधी ग्रंथों की रचना सर्वाधिक हुई। शृंगारिक छंद भी प्रायः इन्हीं रीति-ग्रंथों के अनुकरण में रचे गए, स्वतंत्र सौंदर्यानुभूति के रूप में नहीं।

यद्यपि कुछ कवि—आलम, बोधा, ठाकुर, घनानंद—रीति-विवेचन की परंपरा में नहीं आते, परंतु उन्हें ‘रीतिमुक्त’ श्रेणी में रखकर यह समस्या सहज ही हल हो जाती है।

इस दृष्टि से ‘रीतिकाल’ सर्वाधिक व्यापक और न्यायसंगत नाम है।


निष्कर्ष


अतः विभिन्न संज्ञाओं में ‘रीतिकाल’ ही सबसे युक्तिसंगत, व्यापक और काल की बहुविध प्रवृत्तियों को समाहित करने वाली संज्ञा सिद्ध होती है। शृंगार रस का न्यूनाधिक प्रयोग भी मूलतः एक विशेष प्रकार की ‘रीति’ ही है; इसलिए इस युग को ‘रीतिकाल’ कहना सर्वथा उचित है।



https://www.anubbutisevimarshtak.com/2025/10/ritikal-ki-visheshata.html

रीतिकाल का वर्गीकरण: रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त 


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

🏜️📜 राजस्थानी भाषा : वर्गीकरण, प्रमुख बोलियाँ एवं विशेषताएँ

आदिकाल का नामकरण : एक आलोचनात्मक विवेचन

तुम कहाँ हो