“भारतीय ज्ञान परंपरा वर्तमान समय में उपयोगी है।” (विषय—विपक्ष)

 “भारतीय ज्ञान परंपरा वर्तमान समय में उपयोगी है।” 

                      (विषय—विपक्ष)


✍️ दिनेश नागर, राजस्थान। 


“विरासतें सर पर सजती हैं, पर रास्ते कदमों से बनते हैं,

बीता हुआ कल सीख देता है—पर मंज़िलें आज से बनती हैं।”


मैं माँ शारदा को नमन करता हूँ। आदरणीय मंच, माननीय निर्णायकगण,

उपस्थित विद्वतजन और मेरे साथियों को ससम्मान प्रणाम।

आज मैं इस प्रस्ताव —

“भारतीय ज्ञान परंपरा वर्तमान समय में उपयोगी है”— के पूरी तरह विपक्ष में खड़ा हूँ।


🎙️ प्रस्तावना (स्पष्ट विपक्षीय दृष्टिकोण)


भारतीय ज्ञान परंपरा निस्संदेह गौरवशाली है, पर गौरवशाली होना और वर्तमान समय में व्यावहारिक रूप से उपयोगी होना—दो बिल्कुल अलग बातें हैं।

21वीं सदी की दुनिया AI, रोबोटिक्स, साइबर सुरक्षा, क्वांटम कंप्यूटिंग, बायोटेक्नोलॉजी और जेनेटिक इंजीनियरिंग जैसी अत्याधुनिक चुनौतियों से भरी है।

इन समस्याओं के समाधान— प्राचीन शास्त्रों, धर्मग्रंथों, सूत्रों या मंत्रों में उपलब्ध नहीं मिलते।

आज की ज़रूरत परंपरा नहीं—तकनीक है।


  मुख्य बिंदु (पूरी तरह विपक्षीय तर्क)


🎙️ 1. समस्याएँ आधुनिक हैं—इसलिए समाधान भी आधुनिक चाहिए


प्राचीन ग्रंथों में न तो साइबर क्राइम से सुरक्षा, न डेटा प्राइवेसी, न AI के जोखिम, न डिजिटल युद्ध, और न जैविक हथियारों से बचाव का विज्ञान है।

फिर कैसे कहा जाए कि वही ज्ञान आज भी सीधे उपयोगी है?


🎙️ 2. भाषा, शैली और संरचना — आज की पीढ़ी के लिए अप्रयुक्त


भारतीय ज्ञान परंपरा का बड़ा हिस्सा संस्कृत, प्राकृत और दार्शनिक गूढ़ भाषा में है—

जिसे आज का विद्यार्थी, किसान, मजदूर, श्रमिक या सामान्य युवा समझ ही नहीं पाता।

जो ज्ञान जनता तक न पहुँचे—वह वर्तमान समय में उपयोगी कैसे कहलाए?


🎙️ 3. परंपरा के साथ अंधविश्वास की परत भी जुड़ी रहती है


भारतीय परंपरा के नाम पर आज भी—अवैज्ञानिक उपचार,

चमत्कारवाद, तंत्र-मंत्र, कुरीतियाँ, और तर्कहीन मान्यताएँ

समाज को पीछे खींचती हैं।

आधुनिक भारत को आगे बढ़ाने के लिए प्रयोगशाला, शोध और वैज्ञानिक दृष्टि चाहिए—

न कि अनुष्ठान और कर्मकांड।


🎙️ 4. वैश्विक प्रतिस्पर्धा में परंपरा पर्याप्त नहीं


जब दुनिया मंगल पर घर बसाने, कृत्रिम बुद्धिमत्ता को कानून देने और जीन-संशोधन द्वारा रोग मिटाने में लगी है— तब केवल परंपरा को पकड़े रहना हमें पीछे ही छोड़ेगा।


     “पुरानी नाव से नए समुद्र पार नहीं किए जाते।”


🎙️ 5. भावनात्मक गौरव ≠ व्यावहारिक उपयोगिता

भारतीय ज्ञान परंपरा पर गर्व करना स्वाभाविक है—पर गर्व समाधान नहीं देता।

प्राचीन श्लोक, उपदेश और सूत्र आज की टेक-ड्रिवन दुनिया की समस्याओं को हल नहीं कर सकते।


निष्कर्ष (तेज, सटीक और विपक्षीय)


“सम्मान विरासत को भी है—पर समय बदलाव का भी हकदार है।”


भारतीय ज्ञान परंपरा सांस्कृतिक धरोहर है, भावनात्मक आधार है— किन्तु वर्तमान वैज्ञानिक व तकनीकी आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त उपयोगी नहीं।

आज के समाधान परंपरा की थाली से नहीं, तकनीक की प्रयोगशाला से निकलते हैं। इसलिए मैं स्पष्ट, दृढ़ और तर्कपूर्ण रूप से कहता हूँ—भारतीय ज्ञान परंपरा वर्तमान समय में उपयोगी नहीं है।


धन्यवाद।

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