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आदिकालीन परिस्थितियाँ

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आदिकालीन परिस्थितियाँ हिंदी साहित्य की विकासगाथा एक अनंत प्रवाहमान सरिता है, जिसकी प्रथम लहर आदिकाल से फूटकर संपूर्ण साहित्यिक परंपरा की दिशा निर्धारित करती है। इस युग का विवेचन तभी संभव हो सकता है जब हम उसके युगीन परिवेश का सूक्ष्म अध्ययन करें, क्योंकि परिवेश और इतिहास ही साहित्यिक चेतना के वास्तविक शिल्पी हैं। आदिकालीन साहित्य मात्र शब्द-संरचना नहीं, अपितु उस काल की राजनीतिक अस्थिरता, सामाजिक एवं आर्थिक विषमता तथा मानव-मन की आकांक्षाओं और संघर्षों का जीवन्त प्रतिबिंब है। यह काव्य केवल काव्याभिव्यक्ति भर नहीं, बल्कि युग-यथार्थ का उज्ज्वल दर्पण है, जिसमें तत्कालीन मानव-जीवन के स्वप्न, मूल्य और संघर्ष ध्वनित होते हैं। इसीलिए आदिकाल की कृतियाँ मात्र मनोरंजन का साधन न होकर उस युग की आत्मा की स्पंदन-गाथा कही जा सकती हैं। राजनीतिक स्थिति अंतिम वर्धन सम्राट हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद भारत की संगठित सत्ता छोटे-छोटे राजपूत राज्यों में विभाजित हो गई। अपने अहंकार में हिंदू राजा आपसी युद्धों में उलझे रहते थे। यहाँ तक कि किसी राजा की सुंदर कन्या का अपहरण करने हेतु भी युद्ध छिड़ जाया करते थे। इसी ...