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“भारतीय ज्ञान परंपरा वर्तमान समय में उपयोगी है।” (विषय—विपक्ष)

  “भारतीय ज्ञान परंपरा वर्तमान समय में उपयोगी है।”                        (विषय—विपक्ष) ✍️ दिनेश नागर, राजस्थान।  “विरासतें सर पर सजती हैं, पर रास्ते कदमों से बनते हैं, बीता हुआ कल सीख देता है—पर मंज़िलें आज से बनती हैं।” मैं माँ शारदा को नमन करता हूँ।  आदरणीय मंच, माननीय निर्णायकगण, उपस्थित विद्वतजन  और मेरे साथियों को ससम्मान प्रणाम। आज मैं इस प्रस्ताव — “भारतीय ज्ञान परंपरा वर्तमान समय में उपयोगी है” — के पूरी तरह विपक्ष में खड़ा हूँ। 🎙️ प्रस्तावना (स्पष्ट विपक्षीय दृष्टिकोण) भारतीय ज्ञान परंपरा निस्संदेह गौरवशाली है, पर गौरवशाली होना और वर्तमान समय में व्यावहारिक रूप से उपयोगी होना—दो बिल्कुल अलग बातें हैं। 21वीं सदी की दुनिया AI, रोबोटिक्स, साइबर सुरक्षा, क्वांटम कंप्यूटिंग, बायोटेक्नोलॉजी और जेनेटिक इंजीनियरिंग जैसी अत्याधुनिक चुनौतियों से भरी है। इन समस्याओं के समाधान— प्राचीन शास्त्रों, धर्मग्रंथों, सूत्रों या मंत्रों में उपलब्ध नहीं मिलते। आज की ज़रूरत परंपरा नहीं—तकनीक है।   मुख्य बिंदु (पूर...

रीतिकाल का नामकरण

       रीतिकाल का नामकरण रीतिकाल के नामकरण को लेकर विद्वानों में पर्याप्त मतभेद रहे हैं। विभिन्न आचार्यों ने इस काल की प्रवृत्तियों, काव्य–धारा और विषयवस्तु को आधार बनाकर इसे अलग-अलग संज्ञाओं से अभिहित किया है। नीचे प्रमुख मतों का विवेचन प्रस्तुत है— 1. अलंकृत काल मिश्रबंधुओं ने रीतिकाल को ‘अलंकृत काल’ कहा है। उनका मत था कि इस युग की कविता में अलंकारों की प्रमुखता है और कवियों का ध्यान काव्य को सजाने-संवारने में अधिक लगा रहता था। परंतु यह तर्क सर्वथा स्वीकार्य नहीं है। अलंकरण इस युग की एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति अवश्य है, किन्तु अकेली सर्वव्यापक प्रवृत्ति नहीं। अन्य काव्यांगों—भाव, अनुभूति, भाषा—को भी पर्याप्त स्थान प्राप्त था। साथ ही, इस काल में ऐसे कवि भी हुए जिन्होंने अलंकरण की अपेक्षा भावपक्ष को प्रधानता दी—जैसे आलम, बोधा, घनानंद आदि स्वच्छंद धारा के रचनाकार। अतः केवल अलंकार-प्रधानता के आधार पर नामकरण उचित नहीं ठहरता। 2. शृंगारकाल पं. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने इस युग की शृंगार-प्रधान रचनाओं को आधार बनाकर इसे ‘शृंगारकाल’ कहा। निस्संदेह, अधिकांश रचनाएँ शृंगारिक हैं, पर...