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माँ की छाया

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माँ की छाया — दिनेश नागर, राजस्थान। आज घोंसले पर सन्नाटे ने पंख पसार दिए हैं। दो नन्ही आँखें अब भी आकाश टटोल रही हैं। एक क्रूर छलाँग पंखों तले सिमटी ममता की पूरी दुनिया उजाड़ गई। पिता की व्याकुल उड़ान देर तक आकाश में भटकती रही। पंखों से लड़ा, चोंच से वार किया... फिर घोंसला चुप हो गया। दो नन्हे प्राण घोंसले में सिमटे हैं। आँखों में एक ही प्रश्न— "माँ, तुम कहाँ गई?" हवा भी आज धीमे-धीमे चल रही है। शायद उसने भी इन नन्ही आँखों की व्यथा छू ली हो। और मैं... एक पल की देरी अब भी हृदय में काँटे-सी चुभ रही है। मैंने घोंसले के चारों ओर जाली का एक पहरा खड़ा कर दिया है— जैसे किसी छोटे-से देश ने अपनी सीमाओं पर अंतिम पहरा बिठा दिया हो। कि अब कोई क्रूर पंजा इन नन्हे पंखों तक न पहुँच सके। शायद मनुष्यता यही है— जहाँ जीवन काँप रहा हो, वहाँ एक सहारा बन जाना। और प्रकृति की गोद में आशा अब भी बाकी है। शायद पिता फिर सँभल जाए और इन नन्हे पंखों को उड़ना सिखा दे। कभी-कभी एक छोटा-सा घोंसला पूरे संसार की कथा कह जाता है। अब... रात का अँधकार चुपचाप बीत गया। मैंने दाना रखा, पानी रखा— फिर पिता की आहट सुनता रह...