कामायनी : प्रश्न–उत्तर एवं व्याख्या (जयशंकर प्रसाद कृत)






                    


कामायनी : प्रश्न–उत्तर एवं व्याख्या

(जयशंकर प्रसाद कृत)

चिंता और श्रद्धा सर्ग के विशेष संदर्भ में

 

 

1. ‘कामायनी’ को छायावाद का उपनिषद् किसने कहा है?

(1) शान्तिप्रिय द्विवेदी                        

(2) मुक्तिबोध

(3) निराला                               

(4) रामचंद्र शुक्ल

उत्तर : (1)

व्याख्या :

शान्तिप्रिय द्विवेदी ने ‘कामायनी’ को छायावाद का उपनिषद् कहा है।

 मुक्तिबोध ने इसे फैंटेसी कहा। 

महाप्राण निराला ने इसे रहस्यवाद का प्रथम महाकाव्य माना।

डॉ. नगेन्द्र ने इसे मानव चेतना के विकास का महाकाव्य कहा है तथा दिनकर ने इसे दोषरहित एवं दोषसहित रचना माना है।


2. ‘कामायनी’ के संदर्भ में असंगत कथन है—

(1) कर्म का संदेश और वैराग्य मत का खण्डन

(2) अभेदमूलक अद्वैतवाद का शंखनाद

(3) शाश्वत जीवन और मानुष-कल्याण का काव्य

(4) मानवीय संवेगों का उदात्तीकरण नहीं

उत्तर : (4)

व्याख्या :

‘कामायनी’ में मानवीय भावनाओं और संवेगों का अत्यन्त उच्च स्तर पर उदात्तीकरण हुआ है। अतः चौथा कथन असंगत है।

जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ अद्वैतवाद और मानव-कल्याण की भावना का महाकाव्य है। यह काव्य-रचना वैराग्य मत का खण्डन कर कर्म का दिव्य संदेश देती है। 


3. ‘कामायनी’ में मनु को क्या कहकर संबोधित नहीं किया गया है?

(1) तरंगों से फेंकी मणि                      

 (2) वसंत के दूत

(3) करुणामय सुंदर मौन                  

 (4) इनमें से कोई नहीं

उत्तर : (2)

व्याख्या :

“वसंत के दूत” संबोधन श्रद्धा के लिए प्रयुक्त हुआ है, मनु के लिए नहीं।

 “कौन हो तुम बसंत के दूत,

 विरस पतझड़ में अति सुकुमार!” 

4. असंगत कथन की पहचान कीजिए—

(1) ‘चिंता’ ‘कामायनी’ का पहला सर्ग है।

(2) ‘कामायनी’ की श्रद्धा हृदय का प्रतीक है।

(3) ‘कामायनी’ की कथा सोलह सर्गों में विभक्त है।

(4) ‘कामायनी’ में प्रत्यभिज्ञा दर्शन निहित है।

उत्तर : (3)

व्याख्या :

कामायनी’ की कथा 15 सर्गों में विभक्त है, 16 सर्गों में नहीं। सर्गों का नामकरण ‘चिंता’, ‘श्रद्धा’ आदि मनोभावों के नाम पर किया गया है।


5. “नील परिधान बीच सुकुमार...” –

इन पंक्तियों में किसका सौंदर्य वर्णित है?

(1) मनु                                   

(2) श्रद्धा

(3) लज्जा                          

(4) इड़ा

उत्तर : (2)

व्याख्या :

इन पंक्तियों में श्रद्धा के सौंदर्य का अत्यन्त मनोहारी चित्रण किया गया है।

“नील परिधान बीच सुकुमार,

          खुल रहा मृदुल अधखुला अंग।

 खिला हो ज्यों बिजली का फूल,

 मेघ-वन बीच गुलाबी रंग।।"

 

6. “कामायनी की यह कथा केवल एक फैंटेसी है।”  यह कथन किसका है?

(1) मुक्तिबोध                                             

(2) डॉ. नगेन्द्र

(3) शान्तिप्रिय द्विवेदी                                    

 (4) दिनकर

उत्तर : (1)

व्याख्या :

यह कथन मुक्तिबोध का है। उन्होंने ‘कामायनी’ को कल्पना-प्रधान काव्य अर्थात् फैंटेसी माना है।


7. “वस्तु-विन्यास की दृष्टि से ‘कामायनी’ को दुखान्त रचना मान लेने में कोई आपत्ति नहीं।” उक्त कथन किसका है?

(1) मुकुटधर पाण्डे                               

(2) नन्द दुलारे वाजपेयी

(3) डॉ. शंभुनाथ सिंह                             

(4) रामनरेश त्रिपाठी

(5) इंद्रनाथ मदान

उत्तर : (2)

व्याख्या :

उक्त कथन नन्द दुलारे वाजपेयी का है। इंद्रनाथ मदान ने ‘कामायनी’ को एक असफल कृति माना है।


8. “हृदय की अनुकृति बाह्य उदार,

      एक लम्बी काया, उन्मुक्त; 

      मधु-पवन क्रीड़ित ज्यों शिशु साल, 

      सुशोभित हो सौरभ-संयुक्त।”

‘कामायनी’ की उक्त काव्य-पंक्तियों के संदर्भ में असंगत कथन कौन-सा है? 

 (1) हृदय की उदात्तता का वर्णन

(2) मादकता का वर्णन

(3) उक्त दोनों

(4) मनु का सौंदर्य-वर्णन

उत्तर : (4)

 व्याख्या : 

यहाँ श्रद्धा के सौंदर्य एवं व्यक्तित्व का चित्रण हुआ है, मनु का नहीं।


9. ‘कामायनी’ के दर्शन का केंद्रीय आधार है—

(1) प्रत्यभिज्ञा दर्शन                          

(2) वेदान्त दर्शन

(3) बौद्ध दर्शन                               

(4) सांख्य दर्शन

उत्तर : (1)

व्याख्या :

कामायनी’ का मूल दार्शनिक आधार प्रत्यभिज्ञा दर्शन है।


10. “हे अभाव की चपल बालिके, री ललाट की खललेखा!” – ‘कामायनी’ की इस पंक्ति में ‘अभाव की चपल बालिका’ किसे कहा गया है?

(1) चिंता                                            

(2) करुणा

(3) वेदना                                          

(4) श्रद्धा

उत्तर : (1)

व्याख्या :

यह संबोधन चिंता के लिए प्रयुक्त हुआ है।


11. “पुरातनता का यह निर्मोक सहन करती न प्रकृति पल एक।” – ‘निर्मोक’ का अर्थ क्या है?

(1) केंचुली                                                      

(2) निष्ठुर आघात 

(3) नितान्त अनावश्यक भार                               

(4) शिथिलता

उत्तर : (1)

व्याख्या :

‘निर्मोक’ का अर्थ केंचुली है।

यहाँ श्रद्धा निराश मनु को अप्रासंगिक एवं जड़ पुरातन विचारों का त्याग कर नवीन विचारों को अपनाने की प्रेरणा देती है।

प्रकृति परिवर्तनशील है। वह सदैव नवीनता को स्वीकार करती है। प्राचीनता की केंचुली को प्रकृति एक क्षण भी सहन नहीं करती; वह उसे तुरंत उतार फेंकती है।

12. “काम मंगल से मंडित श्रेय...” – ये पंक्तियाँ किस सर्ग की हैं?

(1) चिंता                                                   

(2) लज्जा

(3) श्रद्धा                                                   

(4) आशा

उत्तर : (3) 

व्याख्या :

ये पंक्तियाँ श्रद्धा सर्ग से ली गई हैं।

“काम मंगल से मंडित श्रेय,

सर्ग-इच्छा का है परिणाम;

तिरस्कृत कर उसको तुम भूल,

बनाते हो असफल भवधाम।


13. “एक दिन सहसा सिंधु अपार, 

      लगा टकराने नग-तल क्षुब्ध।

      अकेला यह जीवन निरुपाय,  

      आज तक घूम रहा विश्रब्ध।।"

‘कामायनी’ से उद्धृत इन पंक्तियों के लिए कौन-सा कथन सही है?

 (1) चिंता सर्ग, मनु का आत्मकथन

(2) श्रद्धा सर्ग, मनु का आत्मपरिचय

(3) लज्जा सर्ग, श्रद्धा का कथन

(4) श्रद्धा सर्ग, मनु को श्रद्धा का प्रत्युत्तर

उत्तर : (4)

व्याख्या :

ये पंक्तियाँ श्रद्धा द्वारा मनु को दिए गए उत्तर का भावपूर्ण चित्रण करती हैं।


14. “एक झिटका-सा लगा  सहर्ष, 

       निस्सृत होने लगे लुटे-से, 

       कौन— 

       गा रहा यह सुंदर संगीत? 

       कुतूहल रह न सका फिर मौन।”

त्रुटिपूर्ण व्याख्या कौन-सी है?

(1) श्रद्धा की मनोदशा का वर्णन

(2) विशेषण-विपर्यय

(3) आश्चर्यचकित होना

(4) शरीर में बिजली-सी दौड़ जाना

उत्तर : (1)

व्याख्या :

यहाँ विकल्पों के अनुसार त्रुटिपूर्ण व्याख्या प्रथम है। मूल भाव में मनु की आंतरिक प्रतिक्रिया, कौतूहल और आश्चर्य का चित्रण हुआ है।


15. “कर रही लीलामय आनन्द-महाचिति सजग हुई-सी व्यक्त” — इस पंक्ति के संबंध में असंगत कथन कौन-सा है?

(1) इस पंक्ति में प्रत्यभिज्ञा दर्शन की छाप दिखाई देती है।

(2) महाचिति विराट चेतना-शक्ति है।

(3) विराट चेतना-शक्ति से ही विश्व का सुंदर विकास होता है।

(4) ये मनु की पंक्तियाँ हैं, जो श्रद्धा को लीलामय जगत का रूप बता रहे हैं।

उत्तर : (4)

व्याख्या :

चौथा कथन असंगत है, क्योंकि यह मनु का नहीं, श्रद्धा का कथन है। यहाँ ‘महाचिति’ अर्थात् विराट चेतना-शक्ति का चित्रण किया गया है।


16. “मधुर विश्रांत और एकांत – जगत का सुलझा हुआ रहस्य, एक करुणामय सुंदर मौन और चंचल मन का आलस्य!” – इन पंक्तियों की असंगत व्याख्या है—

(1) कवि ने ‘सुलझा हुआ रहस्य’ कहकर अपरिचित मनु के किंचित परिचित होने का संकेत किया है।

(2) ‘करुणामय सुंदर मौन’ द्वारा मनु के मुख पर छाई हुई आशा तथा नीरवता का चित्रण किया है।

(3) ‘चंचल मन का आलस्य’ मनु की अकर्मण्यता का सजीव चित्रण करता है।

(4) इस पद में निरंग रूपक तथा विरोधाभास अलंकार है।

उत्तर : (2)

व्याख्या :

‘करुणामय सुंदर मौन’ में मनु की आशा और नीरवता का नहीं, बल्कि उनकी करुणामय भावावस्था का चित्रण है। अतः दूसरा कथन असंगत है।


17. “मधु मारुत-से ये उच्छ्वास” – ‘कामायनी’ में यह पंक्ति किसके द्वारा कही गई है?

(1) श्रद्धा                                                

(2) मनु 

(3) इड़ा                                                

(4) काम

उत्तर : (2)

व्याख्या :

यह पंक्ति मनु द्वारा कही गई है।


18. “देवसृष्टि की सुख-विभावरी, ताराओं की कलना थी।” – पंक्ति में ‘कलना’ का अर्थ है—

(1) प्रवंचना                                               

(2) रजनी

(3) आभा                                                  

(4) विलासिता

उत्तर : (3)

व्याख्या :

यहाँ ‘कलना’ का अर्थ आभा, चमक अथवा ज्योति है।


 

https://www.anubbutisevimarshtak.com/2025/10/ram-ki-shakti-pooja-prashnottar-vyakhya.html 'राम की शक्ति पूजा' - (प्रश्नोत्तर एवं व्याख्या)


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