संदेश

🏜️📜 राजस्थानी भाषा : वर्गीकरण, प्रमुख बोलियाँ एवं विशेषताएँ

  🏜️📜 राजस्थानी भाषा : वर्गीकरण, प्रमुख बोलियाँ एवं विशेषताएँ राजस्थानी भाषा राजस्थान की सांस्कृतिक आत्मा का वह सजीव स्वर है, जिसमें मरुस्थल की लय 🏜️, इतिहास की गूँज 📜 और लोकजीवन की सूक्ष्म अनुभूतियाँ एक साथ प्रवाहित होती हैं। यह केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि वीरगाथाओं की तेजस्विता ⚔️, लोकगीतों की मधुरता 🎶, परम्पराओं की गरिमा तथा जनमानस की भावनाओं का प्रखर वाहक है। मारवाड़ी, मेवाड़ी, हाड़ौती, शेखावटी आदि बोलियों के समन्वय से राजस्थानी भाषा ‘विविधता में एकता’ का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करती है। 📚 राजस्थानी भाषा का वर्गीकरण राजस्थानी भाषा की बहुविध प्रकृति के कारण विभिन्न भाषाविदों ने इसके अनेक वर्गीकरण प्रस्तुत किए हैं— 1️⃣ सर जॉर्ज ग्रियर्सन का वर्गीकरण ( Linguistic Survey of India) पश्चिमी राजस्थानी — मारवाड़ी उत्तरी-पूर्वी राजस्थानी — मेवाती, अहीरवाटी मध्य-पूर्वी राजस्थानी — ढूँढाड़ी, हाड़ौती दक्षिण-पूर्वी राजस्थानी — मालवी, रांगड़ी दक्षिणी राजस्थानी — निमाड़ी 2️⃣ डॉ. टेसीतोरी का वर्गीकरण पश्चिमी राजस्थानी पूर्वी राजस्थानी 3️⃣ नरोत्तम स्वामी का वर्गीकरण पश्चिमी राजस्थ...

“भारतीय ज्ञान परंपरा वर्तमान समय में उपयोगी है।” (विषय—विपक्ष)

  “भारतीय ज्ञान परंपरा वर्तमान समय में उपयोगी है।”                        (विषय—विपक्ष) ✍️ दिनेश नागर, राजस्थान।  “विरासतें सर पर सजती हैं, पर रास्ते कदमों से बनते हैं, बीता हुआ कल सीख देता है—पर मंज़िलें आज से बनती हैं।” मैं माँ शारदा को नमन करता हूँ।  आदरणीय मंच, माननीय निर्णायकगण, उपस्थित विद्वतजन  और मेरे साथियों को ससम्मान प्रणाम। आज मैं इस प्रस्ताव — “भारतीय ज्ञान परंपरा वर्तमान समय में उपयोगी है” — के पूरी तरह विपक्ष में खड़ा हूँ। 🎙️ प्रस्तावना (स्पष्ट विपक्षीय दृष्टिकोण) भारतीय ज्ञान परंपरा निस्संदेह गौरवशाली है, पर गौरवशाली होना और वर्तमान समय में व्यावहारिक रूप से उपयोगी होना—दो बिल्कुल अलग बातें हैं। 21वीं सदी की दुनिया AI, रोबोटिक्स, साइबर सुरक्षा, क्वांटम कंप्यूटिंग, बायोटेक्नोलॉजी और जेनेटिक इंजीनियरिंग जैसी अत्याधुनिक चुनौतियों से भरी है। इन समस्याओं के समाधान— प्राचीन शास्त्रों, धर्मग्रंथों, सूत्रों या मंत्रों में उपलब्ध नहीं मिलते। आज की ज़रूरत परंपरा नहीं—तकनीक है।   मुख्य बिंदु (पूर...

रीतिकाल का नामकरण

       रीतिकाल का नामकरण रीतिकाल के नामकरण को लेकर विद्वानों में पर्याप्त मतभेद रहे हैं। विभिन्न आचार्यों ने इस काल की प्रवृत्तियों, काव्य–धारा और विषयवस्तु को आधार बनाकर इसे अलग-अलग संज्ञाओं से अभिहित किया है। नीचे प्रमुख मतों का विवेचन प्रस्तुत है— 1. अलंकृत काल मिश्रबंधुओं ने रीतिकाल को ‘अलंकृत काल’ कहा है। उनका मत था कि इस युग की कविता में अलंकारों की प्रमुखता है और कवियों का ध्यान काव्य को सजाने-संवारने में अधिक लगा रहता था। परंतु यह तर्क सर्वथा स्वीकार्य नहीं है। अलंकरण इस युग की एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति अवश्य है, किन्तु अकेली सर्वव्यापक प्रवृत्ति नहीं। अन्य काव्यांगों—भाव, अनुभूति, भाषा—को भी पर्याप्त स्थान प्राप्त था। साथ ही, इस काल में ऐसे कवि भी हुए जिन्होंने अलंकरण की अपेक्षा भावपक्ष को प्रधानता दी—जैसे आलम, बोधा, घनानंद आदि स्वच्छंद धारा के रचनाकार। अतः केवल अलंकार-प्रधानता के आधार पर नामकरण उचित नहीं ठहरता। 2. शृंगारकाल पं. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने इस युग की शृंगार-प्रधान रचनाओं को आधार बनाकर इसे ‘शृंगारकाल’ कहा। निस्संदेह, अधिकांश रचनाएँ शृंगारिक हैं, पर...
  🕯️ ‘अंधेरे में’ कविता प्रश्न-उत्तर एवं व्याख्या  (मुक्तिबोध कृत) 1. “...‘अंधेरे में’ कविता की अंतिम पंक्तियाँ अस्मिता या आइडेंटिटी की खोज की ओर संकेत करती हैं।” यह कथन किस आलोचक का है? (1) रामविलास शर्मा (2) डॉ. नगेन्द्र   (3) नामवर सिंह   (4) रामस्वरूप चतुर्वेदी उत्तर एवं व्याख्या: (3)  यह कथन नामवर सिंह का है।यह उन्होंने आधुनिक मनुष्य की अस्मिता-समस्या को रेखांकित करते हुए कहा है। 2. ‘अंधेरे में’ कविता में प्रतीक के रूप में नहीं है – (1) शिशु   (2) तालाब   (3) अरुण कमल   (4) रक्तालोक स्नात पुरुष उत्तर एवं व्याख्या: (2) ‘तालाब’ प्रतीक रूप में नहीं आया है। कविता में अरुण कमल, बरगद, रक्तालोक आदि प्रमुख प्रतीक हैं। 3. ‘अंधेरे में’ कविता में डोमा जी उस्ताद हैं – (1) पत्रकार   (2) साहित्यकार   (3) क्रांतिकारी   (4) कुख्यात हत्यारा उत्तर एवं व्याख्या: (4)  डोमा जी शहर के कुख्यात हत्यारे हैं। 4. ‘अँधेरे में’ कविता के विचित्र जुलूस (प्रोसेशन) में कौन शामिल नहीं था? (1) विद्यार्थी   (2) उद्योगपति   (3) आलोचक   (4) कवि   (5) मंत्री   (6) शहर का हत्यारा उत्तर एवं व्याख्या:...
बिहारी : काव्य, कला और जीवन का पूर्ण समन्वयकारी कवि बिहारी रीतिकाल के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। रीतिकाल को समझने के लिए बिहारी से बड़ा कोई संदर्भ नहीं मिलता। उनकी सबसे बड़ी विशेषता है—कल्पना की समाहारशक्ति के साथ भाषा की समाहारशक्ति। दोहे जैसे छोटे–से छंद में जीवन के बहुआयामी भावों को समेटने में वे पारंगत हैं। बिहारी को रीतिसिद्ध कवि माना गया है। वे मूलतः जीवन और प्रकृति के गहन पर्यवेक्षक कवि हैं। मुक्तककार होने के बावजूद बिहारी ने जीवन की बहुलता, उसकी व्यापकता और गहराई को अत्यंत व्यापक संदर्भों में प्रस्तुत किया है, जिससे प्रत्येक पहलू का सार और उसका गूढ़ अर्थ पाठक के समक्ष स्पष्ट रूप से उभरकर आता है। मध्यकालीन सामंती परिवेश, भौतिकता और चकाचौंध से भरे समाज में, ऐश्वर्य में डूबे राजकुमारों–राजकुमारियों को जीवन की सच्चाइयों, मानवीय मूल्यों और व्यावहारिक अनुभवों की ओर सावधान करने का प्रयत्न उन्होंने लगातार किया। उनके दोहे सामंती मनोवृत्ति पर तीखी टिप्पणी और सूक्ष्म व्यंग्य के रूप में सामने आते हैं, जो जीवन की यथार्थता और सामाजिक चेतना दोनों को प्रकट करते हैं। कहा जाता है कि जब बिहारी राजा जयस...

रीतिकाल का वर्गीकरण : रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त

रीतिकाल का वर्गीकरण : रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने रीतिकालीन काव्य को तीन श्रेणियों – रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त – में विभाजित किया है। यह विभाजन रीतिकाल के कवियों की रचनात्मक प्रवृत्ति, उनकी काव्य–दृष्टि और शास्त्रीय अनुशासन के आधार पर किया गया है। इस वर्गीकरण से रीतिकालीन काव्य की विविध दिशाओं, प्रवृत्तियों और काव्यात्मक चेतना का स्पष्ट ज्ञान होता है। रीतिबद्ध काव्य रीतिबद्ध कवि कविता की बंधी–बंधाई परिपाटी और शास्त्रीय बंधनों से बंधे हुए थे। इनकी कविता निश्चित छंद, रस और अलंकारों के अनुशासन में ढली हुई दिखाई पड़ती है। रीतिबद्ध कवि नायक–नायिका भेद, रसशास्त्र, अलंकारशास्त्र, छंदशास्त्र आदि के अनुरूप उदाहरण–शैली में कविता रचते थे। उनका उद्देश्य शास्त्र के सिद्धांतों का व्यावहारिक रूप से प्रदर्शन करना था। आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र के अनुसार, ‘रीतिबद्ध’ रचना लक्षणों और उदाहरणों से युक्त होती है। किन्तु डॉ. नगेन्द्र इस प्रकार की रचनाएँ करने वाले कवियों को रीतिबद्ध कवि कहने के पक्ष में नहीं हैं। उनका मत है कि इन कवियों ने काव्यशास्त्र का सोदाहरण ...

‘राम की शक्ति पूजा’ — प्रश्नोत्तर एवं व्याख्या

  🕉️ ‘राम की शक्ति पूजा’ — प्रश्नोत्तर एवं व्याख्या (महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ कृत) 1. ‘राम की शक्ति पूजा’ कविता से संबंधित असंगत कथन है – (1) राम–रावण समर का इतना विराट चित्र दुर्लभ है। (2) राम को शक्ति की पूजा का सुझाव जामवंत से मिला था। (3) राम की शक्ति पूजा का उल्लेख श्रीमद्भागवत पुराण में है। (4) राम को रावण पर विजय का वरदान देवी से प्राप्त हुआ था। (5) राम की शक्ति पूजा में राम मानव अधिक, देव कम हैं। (6) कविता की अंतिम पंक्ति है —  “कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन।” उत्तर एवं व्याख्या: (3)  महाप्राण निराला द्वारा रचित ‘राम की शक्ति पूजा’ का आधार बांग्ला ग्रंथ ‘कृत्तिवास रामायण’ है, न कि श्रीमद्भागवत पुराण या रामचरितमानस। यह एक लम्बी, प्रतीकात्मक और दार्शनिक कविता है। 2. ‘राम की शक्ति पूजा’ कविता विषयक असंगत कथन है – (1) यह कविता ‘अनामिका’ के द्वितीय संस्करण में संकलित है। (2) यह सर्वप्रथम ‘दैनिक भारत’ नामक पत्र में प्रकाशित हुई। (3) इसमें ‘तुलसीदास’ और ‘सरोज स्मृति’ दो कविताओं का सार तत्व है। — डॉ. रामविलास शर्मा (4) इनमें से कोई नहीं उत्तर: एवं व्याख...